उत्तर प्रदेश वन निगम

1- स्थापना

उत्तर प्रदेश के वनों के अपेक्षाकॄत अधिक प्रभावी संरक्षण, विकास तथा वनोपज के वैज्ञानिक विदोहन के लिये स्थानीय प्राधिकरण के रुप में उत्तर प्रदेश  वन निगम अधिनियम 1974 के अन्तर्गत 25 नवम्बर 1974 को उत्तर प्रदेश  वन निगम की स्थापना हुई। अन्य प्रदेशों के वन विकास निगम कम्पनी  अधिनियम के अन्तर्गत कम्पनी के रुप  में पंजीकॄत है, जबकि उत्तर प्रदेश वन निगम का गठन राज्य सरकार के स्थानीय निकाय के रुप में उत्तर प्रदेश  वन निगम अधिनियम के उपबन्धों तथा राज्य सरकार के निर्देशों के अधीन किया गया है। उत्तर प्रदेश वन निगम द्वारा सम्पादित किये जा रहे कार्यकलापों को निम्न वर्गो मे रखा गया है:-

 

1.1    वनों से प्रबन्ध योजना के अनुरुप  वनोपज  का निष्कासन  एवं निस्तारण।


1.2    तेन्दूपत्ता संग्रहण एवं निस्तारण का कार्य।


1.3   ललितपुर, झांसी, महोबा, चित्रकूट, मिर्जापुर, सोनभद्र  एवं वाराणसी जनपदों में जडी-बूटी संग्रहण,  भण्डारण  एवं विपणन का कार्य।

 

2. वर्तमान संगठन


उत्तर प्रदेश वन निगम के समस्त कार्यो का संचालन शासन द्वारा गठित प्रबन्ध मण्डल के माध्यम से किया जाता है, प्रबन्धकीय कार्यो के निर्देशन  एवं निष्पादन हेतु लखनऊ स्थित मुख्यालय पर एक प्रबन्ध निदेशक की नियुक्ति शासन द्वारा की जाती है। प्रबन्ध निदेशक  के सहायतार्थ मुख्यालय में अपर प्रबन्ध निदेशक, महाप्रबन्धक (उत्पादन), महाप्रबन्धक (विपणन), महाप्रबन्धक(उद्योग), महाप्रबन्धक (कार्मिक), महाप्रबन्धक (तेन्दू पत्ता), क्षेत्रीय प्रबन्धक (मुख्यालय), कार्मिक प्रबन्धक,  मुख्य लेखाधिकारी एवं वित्तीय परामर्शदाता, वरिष्ठ लेखाधिकारी, योजना एवं मूल्यांकन अधिकारी, प्रशासकीय अधिकारी, लेखाधिकारी(मुख्यालय), विपणन अधिकारी, विक्रय अधिकारी (विपणन) एवं आन्तरिक लेखा परीक्षाधिकारी तैनात किये गये है। प्रबन्ध मण्डल  द्वारा वनोपज  के विदोहन  एवं विपणन  कार्यो के संचालन हेतु 2 महाप्रबन्धक, 6 क्षेत्रीय  प्रबन्धक, 25 प्रभागीय लौगिक/विक्रय प्रबन्धकों की व्यवस्था रखी गयी है।


3. प्रगति सिंहावलोकन


इतिहास के दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश वन निगम के अब तक के कार्यकाल को चार अवधि में विभक्त किया जा सकता है:-

प्रथम - (वर्ष 1974-75 से 1981-82) इस अवधि में वन निगम के कार्य क्षेत्र में शनैः शनैः विस्तार होता रहा ।

द्वितीय - (वर्ष 1982-83 से 1988-89) इस अवधि में वन निगम का उत्पादन शीर्ष पर रहा । तेन्दूपत्ता संग्रहण एंव निस्तारण का कार्य भी वन निगम को दिया गया ।

तृतीय - (वर्ष 1989-90 से 2000-2001) इस अवधि में उत्तर प्रदेश वन निगम में सामाजिक वानिकी तथा कृषि वानिकी कार्य को भी सम्मिलित किया गया, किन्तु उत्पादन प्रति वर्ष कम होता चला गया। नये कार्यो की तलाश जारी रही। 31 मार्च 2001 तक उत्तरांचल एंव उत्तर प्रदेश में अविभाजित प्रदेश की भांति वन निगम कार्य करता रहा।

चतुर्थ - वर्ष 2001-02 से आगे उत्तर प्रदेश वन निगम का कार्य उत्तरांचल राज्य से हट कर मात्र उत्तर प्रदेश में ही सीमित रह गया है।